कृषि से जुड़े लोगों के लिये अब हिन्दी साईट “जवाहर किसान” उपलब्ध

जवाहर किसान नामक ब्लॉग साईट संचार के आधुनिकतम साधनों का उपयोग करके किसानों को त्वरित एवम नवीनतम जानकारी उपलब्ध कराने हेतु लोकप्रिय हो रही है. कृषि विज्ञान केन्द्र-रीवा मे कार्यरत वैज्ञानिक, डॉ चन्द्रजीत सिंह एवं डॉ. किंजल्क सी. सिहं ने कृषक भाई बहनों को सूचना प्रदाय करने हेतु  हिन्दी की ब्लॉग साईट ‘जवाहर किसान’ बनाई ताकि किसान भाई और बहन घर बैठे अपने स्मार्ट फोन पर इंटर्नैट का उपयोग कर  खेती किसानी की जानकारी ले पायें.  साईट खोलने के लिये पता है –jawaharkisan.blogspot.com अथवा गूगल (www.google.com) पर मात्र jawaharkisan लिख कर भी इस साईट को खोला जा सकता है.
डॉ.चन्द्रजीत सिंह बताते हैं कि यह साईट प्रो. एस.व्ही. आर्य, भूतपूर्व कुलपति, ज.ने.क्रि.वि.वि द्वारा प्रदत्त विचारधारा पर आधारित है. प्रो. आर्य के अनुसार् कृषक भाई बहनों द्वारा चाही गई प्रत्येक कृषि सम्बन्धित एवं सम्बन्धित विषयक जानकारी एक ही मंच से लाभार्थीयों को प्राप्त हो सके कुछ ऐसे  प्रयास किये जाने चाहिये..   
डॉ. किंजल्क सी. सिंह बताती है कि कृषक भाई बहन इस साईट से आधुनिक कृषि  तकनीक समबन्धी वैज्ञानिक लेख, अनाज, दलहन एवं तिलहन तथा सब्ज़ी – भाजी, फल एवं फूल की कृषि उपज कार्यमाला, वैज्ञानिक अनुशंसायें आगामी दस दिनों के मौसम की जानकारी, 1500 कृषि समबन्धी विडियो फिल्मे, कृषि उत्पाद का तात्कालिक बाज़ार भाव, 25 चुनिन्दा वार्ता हेतु उपलब्ध वैज्ञानिकों का नाम, विषय सहित मोबाईल नम्बर, कृषि एवं ग्राम विकास सम्बन्धित अन्य विभाग की उन्नत्शील योजनायें एवं अन्य कई उपयोगी साईट की लिंक, साथ ही साथ कृषि विद्यार्थियों हेतु नौकरी समबन्धी जानकारी जैसी अहम जानकारी इस साईट पर उप्लब्ध हैं. इस साईट पर जाकर आप नि:शुल्क सदस्यता भी ग्रहण कर सकते हैं.
इस साईट से अभी तक 11 हज़ार से अधिक लोगों ने लाभ प्राप्त किया है तथा 21 सदस्य हैं. इस साईट पर ऐसी व्यवस्था है कि अन्य भाषा जानने वाले लोग, अनुवाद टूल का उपयोग कर साईट में प्रस्तुत सामग्री को अपनी भाषा में भी पढ़ सकते हैं. इस साईट में प्रस्तुत लेख अथवा कार्यमाला के नीचे दिये गये कमेंट बॉक्स में जा कर कोई भी व्यक्ति अपने विचार लिख कर व्यक्त कर सकता है.
कृषि विज्ञान केन्द्र – रीवा के कार्यक्रम समन्वयक डॉ. अजय कुमार पांडेय ने आह्वान किया कि समूचे प्रदेश के किसान भाई बहन ही नहीं वरन सभी हिन्दी भाषी तथा अन्य भाषाई कृषि से जुड़े किसान भाई बहन, विस्तार अधिकारी, कार्यकर्ता, व्यापारी एवं अन्य सभी को इस साईट से अधिकाधिक लाभ लेना चाहिये.   इस साईट के पाठकगण को फोन तथा वॉट्स अप जैसे माधयमों से भी सहायता पहुँचाई जाती है. 

ग्राम खौर मे पशु टीकाकरण शिविर का आयोजन


दिनांक २२ जून, २००८ को कृषि विज्ञान केन्द्र के अंगीकृत ग्राम खौर मे पशु टीकाकरण शिविर का आयोजन किया गया जिसमें गलघोंटू एवं लंगारिया रोगों के लिए टीका लगाया गया। कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक पशु पालन डॉ रुपेश जैन ने बताया की वर्षा ऋतु में इन बीमारीओं के संक्रमण की संभावना अधिक होती है जिसे देखते हुए इस शिविर के आयोजन का निर्णय लिया गया।

इस शिविर में ५२ किसानो के 210 पशुयों को टीका लगाया गया। कार्यक्रम में केन्द्र के ही वैज्ञानिक डॉ आर पी जोशी, डॉ रघुराज तिवारी एवं डॉ बी एस द्विवेदी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। पशु चिकित्सा महाविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ विवेक अग्रवाल एवं डॉ नितिन बजाज का सहयोग प्रशंसनीय रहा जिन्होंने तकनीकि जानकारी प्रदान करने के साथ साथ पशु टीकाकरण में सहयोग प्रदान किया।

आधुनिक कृषि तकनीक अपनायें और खेती की लागत में कमी लायें


क़ृषि आदान का क्रय करने के पूर्व कृषक भाईयों को सजग रहना बहुत आवश्यक है. आदान क्रय करने के पूर्व नवीनतनम तकनीकी जानकारी के लिये कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा पधार कर सम्बन्धित वैज्ञानिक से निःशुल्क सलाह लें तत्पश्चात कृषि आदान के विक्रय की दुकान जा कर वैज्ञानिकों कि अनुशंसा के अनुसार ही कृषि अदान क्रय करें, अदान हमेशा नगद में क्रय करें, आदान क्रय करते समय एक्स्पायरी तिथि की जाँच अवश्य करें एवं खरीदे गये आदान का कैश मैमो अवश्य लें. उपरोक्त जानकारी अपने उद्बोधन में, विषय विषेशज्ञ डॉ. किंजल्क सी. सिंह ने ग्राम जोरी में, कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा की कार्यक्रम समन्वयक, डॉ. निर्मला सिंह के दिशा निर्देशन में, ‘कृषि आदान क्रय में सावधानिय़ाँ’ विषय पर दिये जा रहे प्रशिक्षण में दी. आपने आगे बताया के आदान का क्रय समय से पूर्व करें ताकि आदान की उप्लब्धता सुनिश्चित हो सके.
केन्द्र के ही वैज्ञानिक, डॉ. चन्द्रजीत सिंह ने कहा की किसान भाई किसान क्रेडिट कार्ड स्कीम का लाभ लें और समय पर बैंक का पैसा लौटायें और डिफॉल्टर बनने से बचें ताकि आने वाले वर्षों में भी इस स्कीम का लाभ आप लेते रहें और समय से पूर्व कृषि आदान क्रय कर सकें.
केन्द्र के मृदा वैज्ञानिक डॉ. बी. एस. द्विवेदी ने जहाँ एक ओर ग्राम के कृषकों के खेत से मृदा का जाँच हेतु मृदा के नमूने एकत्रित किये वहीं जवाहर कल्चर का खरीफ फसलों में उपयोग की समझाईश दी. आपने ज़ोर देते हुये कहा कि जवाहर कल्चर का क्रय किसान भाई, कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा अथवा मृदा विभाग, कृषि महाविद्यालय, रीवा से ही करें.
केन्द्र के द्वारा एंट्री पोईंट एक्टिविटी हेतु, ग्राम भ्रमण के दौरान वैज्ञानिकों ने गोबर और कचरे से भरे, दो साल पुराने गड्ढे को खोदते हुये किसान को मौके पर ही समझाया कि घूरे में दो साल बाद भी गोबर गर्म निकल रहा है और इस प्रकार का गोबर इतने दिनों बाद भी गोबर ही है न की खाद. ऐसा गोबर दीमक और चारे का बहुत ही बड़ा स्त्रोत है और चारे की वजह से खेत पर हानीकारक कीड़ों की संख्या में भी भारी वृद्धि हो जाती है जिसके फलस्वरूप दवाईयों के खर्च का अतिरिक्त बोझ किसानों के ऊपर आ पड़ता है और लाभांश में कमी आ जाती है.
अतः कम लागत के कच्चे भू-नाडेप, टटिया नाडेप अथवा पक्के नाडेप के ज़रीये ही गोबर की खाद बनायें और खेती की लगत में कमी लायें.
किसानों को समझाया गया की फिलहाल जो गोबर घूरों से खोदी जा रही है उसे खेत में डालने के पूर्व ज़मीन के ऊपर पाँच से दस दिन पानी डाल कर ठंडा कर लेने के बाद ही खेत में डालें और आगे से अनुशंसित तरीके से ही खाद बनायें.
प्रशिक्षण को सफल बनाने में ग्राम सचिव श्री जय सिंह जी और गाँव के ही प्रगतिशील कृषक श्री कुशवाहा जी तथा श्री रवि नन्दन सिंह चन्देल जी का सहयोग प्रशंसनीय रहा.   

महिलाओं की भागीदारी से बन सकता है लाभ का व्यवसाय कृषि


किसान यह नहीं जानते हैं कि वो जो बो रहे हैं वह बीज है अथवा दाना इसलिये उत्पादकता के प्रति अनिश्चितता बनी रहती है जिससे बचने के लिये वे आवश्यकता से अधिक बीज दर का उपयोग करते हैं और एक ओर लागत बढ़ाते हैं वहीं दूसरी ओर घनी बोनी करने के कारण प्राकृतिक संसाधन जैसे, धूप, हवा, जल, पोषक तत्व, फैलाव के लिये आवश्यक स्थान का उपयोग नहीं कर पाने के कारण उत्पादन में कमी आती है जिसके कारण आर्थिक नुकसान उठाते हैं.
जब तक बीज देहरी के अन्दर रहता है तब तक महिलायें ही इसका रख रखाव करती हैं. इसी बात को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा के वैज्ञानिक डॉ. चन्द्रजीत सिंह  ने सोयाबीन में बुवाई पूर्व बीज प्रबन्धन विषय पर ग्राम जोरी में 20 महिलाओं और 9 पुरुषों  को विधि प्रदर्शन करते हुए तीन साल कोष जमा कर एक बार नौ तपे के पूर्व गहरी जुताई, उपलब्ध बीज का अंकुरण परीक्षण, प्रति एकड़ बीज दर का निर्धारण, फफूंद्ननाशक तथा रायज़ोबीयम एवं पी.एस.बी कल्चर से बीजोपचार करना तथा 12-14 इंच कतार कतार से बोनी के लिये अपने परिवार के मुखिया को बोनी के लिये निर्णय लेने को ज़ोर दे कर सहायता करने की समझाईश दी.
कार्यक्रम के सफल आयोजन में केन्द्र के मृदा वैज्ञानिक डो बी.एस द्विवेदी की भूमिका महत्वपूर्ण रही.
श्रीमती. माया सिंह, श्रीमति सुधा मिश्रा, ग्राम सचिव श्री. जय सिंह, श्री भुवन सिंह, श्री राज भुवन सिंह की उपस्थिति एवं सहयोग उल्लेख्नीय रहा.       

उत्कृष्टता पुरस्कार से डॉ. अभय वानखेड़े सम्मानित

डॉ. अभय वानखेड़े, वैज्ञानिक, मुख्यमत्री से पुरुस्कार प्राप्त करते हुये 
       कृषि तकनीकी सूचना जानकारी के प्रभावी और त्वरित फैलाव के लिये सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग हेतु किसान मोबाइल संदेश कार्यक्रम के योजना निर्माण व क्रियान्वयन हेतु ज.ने. कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत कार्यरत कृषि विज्ञान केन्द्र सिवनी के प्रभारी कार्यक्रम समन्वयक डा. अभय वानखेड़े को म.प्र. शासन का प्रतिष्ठित र्इ-उत्कृष्टता पुरस्कार प्रदान किया गया। प्रदेश स्तर पर विभिन्न श्रेणियों में कुल 23 प्रतिभागियों का चयन उच्च स्तरीय चयन समिति द्वारा भोपाल में प्रस्तुतिकरण के आधार पर किया। कृषि मंत्री श्री गौरीशंकर बिसेन, सूचना प्रौधोगिकी मंत्री श्री भूपेन्द्र सिंह एवं प्रदेश के मुख्य सचिव श्री अंटोनी डिसाजी की गरिमामयी उपस्थिति में प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के कर कमलों द्वारा प्रदान किया गया। व्यकितगत श्रेणी में डा. अभय वानखेड़े के कार्य की सराहना करते हुये मुख्य सचिव महोदय ने इस कार्यक्रम के अधिकाधि उपयोग हेतु प्रेरित किया। जवाहरलाल नेहरू कृषि विद्यालय, जबलपुर (म.प्र.) के माननीय कुलपति प्रो. विजय सिंह तोमर के दिशा निर्देशन एवं संचालक विस्तार सेवायें डा. पी. के. मिश्रा के कुशल नेतृत्व में किये अनुकरणीय कार्य की प्रदेश के कृषि मंत्री श्री गौरीशंकरजी बिसेन द्धारा सराहा गया। 
ज्ञात हो कि डॉ. अभय वानखेड़े द्वारा वर्ष  2007 से किसानों को खेती की आवश्यक      जानकारी जैसे आदान उपलब्धता,  कृषकों के लिये  उपयोगी योजनायें एवं मौसम की सूचना को संदेश  के रूप में कृषकगण के मोबाईल फोन पर भेजने  का कार्य प्रारम्भ किया था जिस पर मंडी की  सूचना,  अनाज बेचने की जानकारी, बैंक में  जमा  एवं  निकासी की सूचना भी भेजी जा रही  है।
        उल्लेखनीय है कि कृषि विश्वविद्यालय के किसी  वैज्ञानिक को पहली बार यह सम्मान प्रदेश शासन द्वारा प्रदाय किया गया है। कृषि विज्ञान केन्द्र, सिवनी के समस्त वैज्ञानिकों एवं मित्रों इन्हें सम्मान प्राप्त करने हेतु बधार्इ दी है। 

खरीफ में खरपतवार, कीड़ों और दीमक से छुटकारा पाने हेतु अभी सक्रिय हों किसान


कृषि विज्ञान केन्द्र-रीवा के कार्यक्रम समन्वयक डॉ अजय कुमार पांडेय़ ने कृषक भाईयों और बहनों से आह्वान किया है कि खरीफ की तैयारी के पहले कृषि तकनीकी के योजना बनाने के लिये और नवीनतम जानकारी के लिये केन्द्र पर पधारें और वैज्ञानिक अनुशंषा मुफ्त पायें . आगे आपने कहा के बीज की जाँच करने के लिये गीले बोरे में सौ दाने बिछा कर दो दिन तक गीला रखें. यदि 75 दाने से अधिक दाने अंकुरित होते हैं तो बीज की अनुषंशित बीज दर का उपयोग करें.यदि बीज पुराना है तो कम दाने अंकुरित होंगे जिसे बदल कर नया बीज लेने में ही समझ्दारी है . वैसे भी प्रति तीन सालों  में बीज का ओज घट जाता है अतः उत्पादन मे कमी देखी जाती है.         
हिला कृषक तकनीक के वैज्ञानिक डॉ. चद्रजीत सिंह ने  जानकारी दी कि खरीफ के मौसम में सबसी बडी समस्या खरपतवार, दीमक और कीड़े की होती है और यदि  कृषक बहनें और किसान भाई इस समस्या से बचना चाहते हैं तो वर्षा ऋतु में घर के पीछे गढ्ढे (घूरे)  में पिछ्ले साल के एकत्रित से गर्म गोबर को निकाल कर खेत में न डालें बल्कि अभी तुरंत घूरे को खोद कर गोबर को ज़मीन के ऊपर इकट्ठा कर ढेर बनायें और पानी से तर कर दें. लगभग 15 दिन बाद फिर इस घूरे को फिर सींचें. एक महिने से डेढ़ महिने में यह गोबर ठंडा हो जायेगा और इसमें से भाप निकलना बन्द हो जायेगी. तब इसे खेत में डालें. जिससे खेत में रुपये में 60-70 पैसे तक खरपतवार दीमक और कीड़ों की संख्या में कमी आ जायेगी.
कृषि विस्तार वैज्ञानिक डॉ. किंजल्क सी. सिंह ने जानकारी दी कि तीन साल में नौतपे के पूर्व खेत की गहरी जुताई करवायें जिससे धूप की सीधी  किरणे मृदा पर पड़ने के कारण खरपतवार के बीज नष्ट हो जाते हैं और खरपतवार की संख्या में भारी कमी आ जायेगी. आपने आगे बताया कि रबी के मौसम में किस खेत में दल्हन फसल बोई गईं थीं कृषक भाई उन खेतों में धान्य फसलें बोयें और जहाँ धान्य फसलें बोई थीं उन खेतों में दलहनी फसलों की बोनी करें जिससे मृदा पोषण का लाभ फसलों को मिलेगा और पैदावार में वृद्धि होगी. खरीफ की बोनी फफून्दनाशक दवा और जैव ऊर्वरक से बीज के उपचार के बाद ही करें.  

रीवा ज़िले में सोयबीन की खेती के नये प्रयोग से अधिक लाभ


कृषि विज्ञान केन्द्र के कार्यक्रम सम्न्वयक डॉ. ए. के. पाँडेय ने बाताया कि केन्द्र द्वारा अंगीकृत किसानों के द्वारा सोयाबीन की खेती 140 किलो एस.एस.पी (राखड़), 18 किलो म्युरेट ऑफ पोटाश ( लाल खाद) और 13 किलो युरिया के सम्मिश्रण के उपयोग द्वारा किया जा रहा है. आपने आगे बताया कि तिलहन फसलों में तेल की मात्रा बढ़ाने हेतु राखड़ में उपलब्ध सल्फर नामक तत्व आवश्यक होता है जिससे सोयबीन के दाने बड़े तथा चमकदार बनते हैं और उपज का बाज़ार भाव बेहतर मिलता है.
कृषि में महिलाओं के योगदान विषय पर कार्य कर रहे वैज्ञानिक डॉ. चन्द्रजीत सिंह ने बाताया कि ग्राम लक्ष्मणपुर की महिला कृषक श्रीमति कलावती पटेल, पत्नी श्री रामसुमिरन पटेल ने नौतपे के पूर्व खेत की गहरी जुताई करवाई तथा बीज के अंकुरण की जाँच के उपरांत बीज का उपचार 150  ग्राम ट्राईकोडर्मा फफूँदनाशक तथा 250 ग्राम राईज़ोबियम और 600 ग्राम पी.एस.बी कल्चर प्रति एकड़ बीज से उपचारित करने के बाद 30किलो बीज प्रति एकड़ की बोनी कतार छोड़ पद्धति से की जिसमें कतार से कतार की दूरी 18 इंच है. इस दूरी के कारण सूर्य की किरणें  ज़मीन तक पहुँचती हैं और इस कारण कीटों का आक्रमण प्रभावशाली ढंग से कम होता है तथा पूरे पौधे पर सूर्य की रौशनी पड़ने के कारण समूचे पौधे में समान रूप से फलन होता है. कतार से कातार की बढ़ी हुई दूरी के कारण पौधे की शाखाओं में फैलाव भी अधिक होता है जिस कारण से फलन और अधिक होता है और उत्पादन में वृद्धि होती है.
केन्द्र के शस्य वैज्ञानिक डॉ. रघुराज किशोर तिवारी ने आगे बताया कि कुठुलिया में श्री प्रियेश कनौडिया ने भी इस प्रयोग को अपने खेत में दोहराया है साथ ही साथ आपने प्रत्येक दस कतार के उपरांत ढाई फुट का रास्ता कीट तथा खरपतवार के नियंत्रण हेतु दवाई छिड़कने के लिये छोड़ी है.
कृषि विस्तार की वैज्ञानिक डॉ, किंजल्क सी, सिंह ने बताया कि गुड़हर के कृषक श्री गोपेन्द्र त्रिपाठी जी ने सोयाबीन की अत्याधुनिक तकनीक अपनाते हुये मेड़- नाली विधि से सोयाबीन की बोनी की है. जिससे कतार से कतार की दूरी 12 इंच होती है और पौधे का फैलाव अच्छा होने के कारण फसलोत्पादन में वृद्धि होती है तथा सोयाबीन की बोनी, पानी से दूर मेड़ पर होती है, अधिक वर्षा होने कि स्थिति में नालियों से पानी खेत से बाहर हो जाता है और फसल को नुकसान नहीं होता है. चूँकि मेड़ भुरभुरी होती हैं इस कारण पौधे की जड़ का फैलाव अच्छा होता है और पौधे का विकास बेहतर होता है. जब पानी की कमी होती है तो यही नालियाँ सिंचाई के काम आती हैं. बाकी कृषि कार्यमाला कतार-छोड़ पद्धति की ही तरह ही अपनाई गई है.
कृषक भाई बहनों से केन्द्र ने अपील है कि वे इन खेतों का भ्रमण कर नई विधियों का अनुभव लें और अपने खेतों पर भी इन्हें अपना कर अधिकाधिक लाभ अर्जित करें. 

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