बीज के अंकुरण की जाँच और बीजोपचार अवश्य करें – डॉ. अजय कुमार पांडेय



रबी के फसलों के बीज को बोनी पूर्व छानें, बीनें तथा 100 बीज के अंकुरण की जाँच करें, यदि 75 बीज अंकुरित हो जायें तो प्रति एकड़ 32 किलो चना और अथवा 40 किलो गेहूँ की दर से बोनी करें. बोनी के पूर्व, चने के बीज का उपचार 3 ग्राम प्रति किलो बीज, ट्राईकोडर्मा विर्डी जैविक फफूँदनाशक अथवा 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से कार्बैंडाज़िम एवं मैंकोज़ैब की संयुक्त रासायनिक फफूँदनाशक दवा से उपचारित करें. साथ ही 5 ग्राम रायज़ोबियम तथा 5 ग्राम पी.एस.बी. कल्चर प्रति किलो बीज की दर से एवं प्रति किलो गेहूँ को 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज, कार्बॉक्सिन एवं थीरम की संयुक्त फफूँदनाशक दवा (100 ग्राम प्रति 40 किलो प्रति एकड़) से, साथ में 3 ग्राम पी.एस.बी. तथा 3 ग्राम ऐज़ैटोबक्टर कल्चर से उपचारित करें. इन उपायों से कम खर्च में ही रबी फसलों के उत्पादन में वृद्धि होगी. उपरोक्त समझाईश कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा की कृषि विस्तार वैज्ञानिक डॉ. किंजल्क सी. सिंह ने ग्राम पड़िया में ‘रबी फसलों की खेती में लागत में कमी’ विषय पर आयोजित गैर संस्थागत् प्रशिक्षण में 34 महिला कृषक़ो को दी.

डॉ. चन्द्रजीत सिंह, खाद्य वैज्ञानिक  ने बताया कि सीड ड्रिल की पेटी में परिवर्तन कर, तीन खाने बना कर,  चने की 7 कतार के उपरांत 2 कतार धनिया की अंतर्वर्तीय फसल लगायें. धनिये की खुशबू के कारण चने में इल्ली नहीं आयेगी, साथ में धनिया पत्ती और धने (धनिया का बीज़: लगभग 1.25 क्विंटल प्रति एकड़ का उत्पादन) का अतिरिक्त लाभ भी होगा और कीटनाशक के छिड़काव के खर्च की बचत भी होगी. फूल अवस्था में प्रति एकड़ खेत में 20 अंग्रेज़ी की ‘वाय’ आकार की अथवा ‘टी’ आकार की चने के पौधों से ऊँची खूँटियाँ लगा कर चिड़ियों को बैठने दें जो बची हुई इल्लियों को खेत से हटा देंगी. इन खूँटियों को फल अवस्था में अवश्य हटा दे. यदि बाद में दोबारा इल्लियाँ आने का खतरा हो तो प्रति एकड़ खेत में देशी, खुशबू वाली धनिया की चटनी को पानी में घोल कर, 200 लीटर धनिया की खुशबू से युक्त घोल का छिड़काव करें, इस तकनीक को किसान बहनें और भाई जवाहर किसान वैज्ञानिक एवं तकनीकी यू-ट्यूब चैनल में भी विडियो देख सकते है. प्रशिक्षणार्थियों की ओर से श्रीमति मनोज सिंह, श्रीमति सविता विश्वकर्मा तथा श्रीमति किरण पटेल ने प्रशिक्षण को बहुत उपयोगी तथा समसामायिक बताया.  उपरोक्त प्रशिक्षण केन्द्र के प्रमुख एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार पाँडेय के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ.      

पोषण तथा स्वावलम्बन हेतु श्रीअन्न प्रसंस्करण आवश्यक– डॉ. ए.के.पांडेय

   


कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा (म.प्र.) की तत्वावधान में ज़िला पंचायत, रीवा तथा एन.आर.एल.एम., रीवा के सहयोग से पोषण तथा स्वावलम्बन हेतु पाँच दिवसीय रोज़गारोन्मुखी कौशलसंवर्धन प्रशिक्षण, आयोजित किया गया जिसमें पैंसठ ग्रामीण प्रशिक्षणार्थियों ने भाग लिया.


वैज्ञानिक (कृषि विस्तार) तथा प्रशिक्षक डॉ. किंजल्क सी. सिंह ने बताया कि प्रशिक्षण में ‘करके सीखे’ के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुये प्रशिक्षणार्थियों ने बाजरे के लड़्डू, रागी के लड़्डू, ज्वार की बर्फी, बाजरा, ज्वार, रागी, मक्का की सलोनी, मक्का की नमकीन, रागी की इडली, डोसा, केक, कुकीज़, और चॉकलेट का निर्माण किया गया तथा कोदो, कुटकी साँवा और काकून के खीर जैसे व्यंजनों में उपयोग के बारे में बतया गया.  


वैज्ञानिक (खाद्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी) एवं  प्रशिक्षक डॉ. चन्द्रजीत सिंह ने बताया कि चूँकि श्री अन्न में ग्लूटैन अनुपस्थित होता है अत: इनकी रोटी बनाना सरल नहीं है अतः ऐसे खाद्य उत्पादों का निर्माण सिखाया गया जिनकी निर्माण विधि सरल है. इनमें स्वास्थ्यवर्धक खनिज लवण विषेशकर कैल्शियम और लौह तत्व प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो कि ह्ड्डियों के स्वास्थ्य, पाचन और डायबटीज़ को नियंत्रित रखने के लिये तथा रक्ताल्पता को दूर रखने में सहायक होता है. किंतु श्रीअन्न रूक्ष होता है अतः कब्ज़ और वात का सामना कर रहे लोगों को इसका सेवन कम करना चाहिये. समामन्य तौर पर स्वस्थ्य व्यक्तियों द्वारा इसका सेवन देसी घी के साथ करने से इसकी रुक्षता में कमी लाई जा सकती है.


आगे केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. अजय कुमार पांडेय ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, भारत के नेतृत्व में सन् 2023 को समूचे विश्व में श्रीअन्न वर्ष के रूप में मनाया गया. इसी तारत्म्य में ग्रामीण अंचलों में श्री अन्न के उपयोग को बढ़ाने के उद्देश्य से प्रशिक्षण आयोजियत किया गया है. कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में विश्व गायत्री परिवार से श्री प्रभाकांत तिवारी, श्री एस.पी.मिश्रा श्री रवीन्द्र सिंह एवं श्रीमति सविता मिश्रा  उपस्थित थे. कार्यक्रम में वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आर. पी. जोशी ने अपने उद्बोधन और प्रक्षेत्र भ्रमण के माध्यम से प्रशिक्षणार्थियों को श्री अन्न की विभिन्न किस्मों से परिचित करवाया तथा मौसम वैज्ञानिक श्री सन्दीप शर्मा ने श्री अन्न की खेती में मौसम की भूमिका विषय पर प्रकाश डाला.


प्रशिक्षण को और उपयोगी बनाने के लिये, सफल व्यवसाई श्री प्रियेश कनौडिया, ज़िला उद्योग से श्री. जे. पी. तिवारी, लीड बैंक प्रबन्धन श्री जगमोहन, पशुपालन विभाग से डॉ. डी.एस. बघेल विशिष्ट व्याख्यान भी कार्यक्रम में सम्मिलित किये गये.


कार्यक्रम के समापन सत्र में कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. एस.के. त्रिपाठी ने ग्रामीण भारत के विकास में कृषि विज्ञान केन्द्र की महती भूमिका में प्रकाश डालते हुये कहा कि यह प्रशिक्षण ग्राम विकास के क्षेत्र में एक नया अध्याय लिखेगा साथ ही आपने प्रशिक्षणार्थियों को प्रमाण पत्र भी वितरित किये. कार्यक्रम में केन्द्र, के वैज्ञानिकगण डॉ. राजेश सिंह, डॉ. अखिलेश कुमार, डॉ. स्मिता सिंह, डॉ. केवल सिंह बघेल, श्री मृत्युंजय कुमार मिश्रा, गायत्री परिवार से श्री विनोद कुमार पांडेय जी, अखंड पर्यावरण संस्थान से डॉ. अभयराज ने अपनी गरिमामई उपस्थिति दर्ज़ की.  कार्यक्रम की सफलता में श्रीमति राम बाई तिवारी जी तथा कृष्णा उत्थान समिति के श्री कृष्णधर द्विवेदी ‘शास्त्री जी’  का विशेष सहयोग रहा.    

लौह तत्व की आपूर्ति हेतु हरी पत्तेदार सब्जियों तथा खट्टे फलों का सेवन करें


कृषि महाविद्यालय -रीवा के अधिष्ठाता डॉ. एस. के.पाँडेय के मार्गदर्शन तथा कृषि विज्ञान केंद्र -रीवा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. अजय कुमार पाँडेय के दिशा निर्देशन में राष्ट्रीय  पोषण मास के अवसर पर सुपोषण स्मार्ट ग्राम बजरंगपुर में 'पौष्टिक भोजन तथा स्वास्थ्य' विषय पर दिनाँक 25 सितम्बर, 2019 को  प्रशिक्षण आयोजित किया गया । गैर संस्थागत प्रशिक्षण के फीड-बैक सत्र में श्रीमती लालमति साकेत ने बताया कि प्रशिक्षण में हमने सीखा कि ग्रामीण माताओं- बहनों के रक्त में लाली बढ़ाने हेतु लौह तत्व की आपूर्ति के लिये अधिकाधिक हरी पत्तेदार सब्ज़ी, गुड़, अनार, चुकंदर और खट्टे फल आदि का सेवन करना चाहिये । इस प्रशिक्षण में 43 हितग्राहियों ने भाग लिया ।
प्रशिक्षण के प्रारंभ में केंद्र के खाद्य वैज्ञानिक डॉ. चंद्रजीत सिंह ने परामर्श दिया कि आगामी सर्दी के मौसम में शरीर पर तेल लगा कर दोपहर में धूप ज़रूर सेकें जिससे शरीर में विटामिन-डी का निर्माण होगा जो कि कैल्शियम के अवशोषण हेतु आवश्यक है । ऐसा करने से शरीर की हड्डियाँ और जोड़ स्वस्थ रहेंगे ।
प्रशिक्षण के सफल आयोजन में केंद्र की वैज्ञानिक डॉ. किंजल्क सी सिंह, महिला बाल विकास विभाग की आँगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती सुनीता पटेल, आंगनबाड़ी सहायिका श्रीमती श्यामाबाई साकेत, कृषक मित्र श्री राजेश पटेल एवं केंद्र के श्री उमेश वर्मा की भूमिका प्रशंसनीय रही । साथ ही श्रीमती स्नेहा साकेत, श्री अंकित साकेत तथा रोहित साकेत की कार्यक्रम में उपस्थिति उल्लेखनीय रही ।

कृषि में रसायनों का उपयोग अंतिम विकल्प के रूप में करें - डॉ. किंजल्क सी.सिंह



 जलवायु परिवर्तन का संकट, निरंतर हमारी सोच और समझ से आगे की चुनौती दे रहा है जिसका सीधा प्रभाव कृषि  पर देखा जा सकता है । मृदा का बढ़ता तापमान, असमय वर्षा और वर्षा का असमान वितरण जैसे कारकों से मृदा की क्षमता में कमी आ रही है तथा कीट-पतंगों से फैलने वाली बीमारियाँ बड़े पैमाने पर बढ़ रही हैं, जिससे उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है । इस स्थिति से निपटने के लिये प्रति व्यक्ति वृक्षों की संख्या में वृद्धि, जल का विवेकपूर्ण उपयोग, बीज के अंकुरण की जाँच, सक्रिय जैव उर्वरक और फफूँदनाशक से बीजोपचार, वायु की उपस्थिति में गोबर की खाद तथा केंचुआ खाद का निर्माण एवं उपयोग, ट्रैप क्रॉप, बर्ड पर्च, फैरोमैन ट्रैप, टपक सिंचाई, फव्वारा सिंचाई जैसी तकनीकियों का उपयोग कर रासायनिक दवाईयों को अंतिम विकल्प के तौर पर देखना ही ठीक होगा ।
उक्त विचार, डॉ. किंजल्क सी .सिंह, वैज्ञानिक, विस्तार सेवायेंकृषि विज्ञान केंद्र-रीवा के हैं, जिन्होंने ग्राम कोठी में, कृषि विज्ञान केंद्र -रीवा द्वारा आयोजित प्रशिक्षण में प्रशिक्षणार्थियों को परमार्श दिया । लाभकारी कृषि हेतु जलवायु अनुकूलन तकनीकियाँ विषय पर यह प्रशिक्षण, वरिष्ठ वैज्ञानिक तथा केंद्र प्रमुख डॉ. अजय कुमार पाँडेय के मार्गदर्शन में, दिनाँँक 27 सितम्बर, 2019 आयोजित किया गया जिसमें 27 कृषक भाई-बहनों ने भाग लिया ।
प्रशिक्षण में, केंद्र के ही खाद्य वैज्ञानिक डॉ. चंद्रजीत सिंह ने खेत की स्वच्छता को प्राथमिकता देने की समझाईश दी जिससे खेत पर खरपतवार, कीट और रोग का संक्रमण स्वतः कम हो जाये । महिला बाल विकास विभाग की पर्यवेक्षक श्रीमति सपना तिवारी ने पर्यावरण तथा प्रकृति की मर्यादा के अनुकूल जीवनयापन करने की सलाह दी ।
ग्राम कोठी की आँगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमति साधना मालवीय ने कार्यक्रम की सफलता हेतु समस्त प्रतिभागियों का आभार प्रकट किया । कार्यक्रम में केंद्र से श्री उमेश वर्मा की उपस्थित उल्लेखनीय रही ।


कृषि से जुड़े लोगों के लिये अब हिन्दी साईट “जवाहर किसान” उपलब्ध

जवाहर किसान नामक ब्लॉग साईट संचार के आधुनिकतम साधनों का उपयोग करके किसानों को त्वरित एवम नवीनतम जानकारी उपलब्ध कराने हेतु लोकप्रिय हो रही है. कृषि विज्ञान केन्द्र-रीवा मे कार्यरत वैज्ञानिक, डॉ चन्द्रजीत सिंह एवं डॉ. किंजल्क सी. सिहं ने कृषक भाई बहनों को सूचना प्रदाय करने हेतु  हिन्दी की ब्लॉग साईट ‘जवाहर किसान’ बनाई ताकि किसान भाई और बहन घर बैठे अपने स्मार्ट फोन पर इंटर्नैट का उपयोग कर  खेती किसानी की जानकारी ले पायें.  साईट खोलने के लिये पता है –jawaharkisan.blogspot.com अथवा गूगल (www.google.com) पर मात्र jawaharkisan लिख कर भी इस साईट को खोला जा सकता है.
डॉ.चन्द्रजीत सिंह बताते हैं कि यह साईट प्रो. एस.व्ही. आर्य, भूतपूर्व कुलपति, ज.ने.क्रि.वि.वि द्वारा प्रदत्त विचारधारा पर आधारित है. प्रो. आर्य के अनुसार् कृषक भाई बहनों द्वारा चाही गई प्रत्येक कृषि सम्बन्धित एवं सम्बन्धित विषयक जानकारी एक ही मंच से लाभार्थीयों को प्राप्त हो सके कुछ ऐसे  प्रयास किये जाने चाहिये..   
डॉ. किंजल्क सी. सिंह बताती है कि कृषक भाई बहन इस साईट से आधुनिक कृषि  तकनीक समबन्धी वैज्ञानिक लेख, अनाज, दलहन एवं तिलहन तथा सब्ज़ी – भाजी, फल एवं फूल की कृषि उपज कार्यमाला, वैज्ञानिक अनुशंसायें आगामी दस दिनों के मौसम की जानकारी, 1500 कृषि समबन्धी विडियो फिल्मे, कृषि उत्पाद का तात्कालिक बाज़ार भाव, 25 चुनिन्दा वार्ता हेतु उपलब्ध वैज्ञानिकों का नाम, विषय सहित मोबाईल नम्बर, कृषि एवं ग्राम विकास सम्बन्धित अन्य विभाग की उन्नत्शील योजनायें एवं अन्य कई उपयोगी साईट की लिंक, साथ ही साथ कृषि विद्यार्थियों हेतु नौकरी समबन्धी जानकारी जैसी अहम जानकारी इस साईट पर उप्लब्ध हैं. इस साईट पर जाकर आप नि:शुल्क सदस्यता भी ग्रहण कर सकते हैं.
इस साईट से अभी तक 11 हज़ार से अधिक लोगों ने लाभ प्राप्त किया है तथा 21 सदस्य हैं. इस साईट पर ऐसी व्यवस्था है कि अन्य भाषा जानने वाले लोग, अनुवाद टूल का उपयोग कर साईट में प्रस्तुत सामग्री को अपनी भाषा में भी पढ़ सकते हैं. इस साईट में प्रस्तुत लेख अथवा कार्यमाला के नीचे दिये गये कमेंट बॉक्स में जा कर कोई भी व्यक्ति अपने विचार लिख कर व्यक्त कर सकता है.
कृषि विज्ञान केन्द्र – रीवा के कार्यक्रम समन्वयक डॉ. अजय कुमार पांडेय ने आह्वान किया कि समूचे प्रदेश के किसान भाई बहन ही नहीं वरन सभी हिन्दी भाषी तथा अन्य भाषाई कृषि से जुड़े किसान भाई बहन, विस्तार अधिकारी, कार्यकर्ता, व्यापारी एवं अन्य सभी को इस साईट से अधिकाधिक लाभ लेना चाहिये.   इस साईट के पाठकगण को फोन तथा वॉट्स अप जैसे माधयमों से भी सहायता पहुँचाई जाती है. 

ग्राम खौर मे पशु टीकाकरण शिविर का आयोजन


दिनांक २२ जून, २००८ को कृषि विज्ञान केन्द्र के अंगीकृत ग्राम खौर मे पशु टीकाकरण शिविर का आयोजन किया गया जिसमें गलघोंटू एवं लंगारिया रोगों के लिए टीका लगाया गया। कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक पशु पालन डॉ रुपेश जैन ने बताया की वर्षा ऋतु में इन बीमारीओं के संक्रमण की संभावना अधिक होती है जिसे देखते हुए इस शिविर के आयोजन का निर्णय लिया गया।

इस शिविर में ५२ किसानो के 210 पशुयों को टीका लगाया गया। कार्यक्रम में केन्द्र के ही वैज्ञानिक डॉ आर पी जोशी, डॉ रघुराज तिवारी एवं डॉ बी एस द्विवेदी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। पशु चिकित्सा महाविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ विवेक अग्रवाल एवं डॉ नितिन बजाज का सहयोग प्रशंसनीय रहा जिन्होंने तकनीकि जानकारी प्रदान करने के साथ साथ पशु टीकाकरण में सहयोग प्रदान किया।

आधुनिक कृषि तकनीक अपनायें और खेती की लागत में कमी लायें


क़ृषि आदान का क्रय करने के पूर्व कृषक भाईयों को सजग रहना बहुत आवश्यक है. आदान क्रय करने के पूर्व नवीनतनम तकनीकी जानकारी के लिये कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा पधार कर सम्बन्धित वैज्ञानिक से निःशुल्क सलाह लें तत्पश्चात कृषि आदान के विक्रय की दुकान जा कर वैज्ञानिकों कि अनुशंसा के अनुसार ही कृषि अदान क्रय करें, अदान हमेशा नगद में क्रय करें, आदान क्रय करते समय एक्स्पायरी तिथि की जाँच अवश्य करें एवं खरीदे गये आदान का कैश मैमो अवश्य लें. उपरोक्त जानकारी अपने उद्बोधन में, विषय विषेशज्ञ डॉ. किंजल्क सी. सिंह ने ग्राम जोरी में, कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा की कार्यक्रम समन्वयक, डॉ. निर्मला सिंह के दिशा निर्देशन में, ‘कृषि आदान क्रय में सावधानिय़ाँ’ विषय पर दिये जा रहे प्रशिक्षण में दी. आपने आगे बताया के आदान का क्रय समय से पूर्व करें ताकि आदान की उप्लब्धता सुनिश्चित हो सके.
केन्द्र के ही वैज्ञानिक, डॉ. चन्द्रजीत सिंह ने कहा की किसान भाई किसान क्रेडिट कार्ड स्कीम का लाभ लें और समय पर बैंक का पैसा लौटायें और डिफॉल्टर बनने से बचें ताकि आने वाले वर्षों में भी इस स्कीम का लाभ आप लेते रहें और समय से पूर्व कृषि आदान क्रय कर सकें.
केन्द्र के मृदा वैज्ञानिक डॉ. बी. एस. द्विवेदी ने जहाँ एक ओर ग्राम के कृषकों के खेत से मृदा का जाँच हेतु मृदा के नमूने एकत्रित किये वहीं जवाहर कल्चर का खरीफ फसलों में उपयोग की समझाईश दी. आपने ज़ोर देते हुये कहा कि जवाहर कल्चर का क्रय किसान भाई, कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा अथवा मृदा विभाग, कृषि महाविद्यालय, रीवा से ही करें.
केन्द्र के द्वारा एंट्री पोईंट एक्टिविटी हेतु, ग्राम भ्रमण के दौरान वैज्ञानिकों ने गोबर और कचरे से भरे, दो साल पुराने गड्ढे को खोदते हुये किसान को मौके पर ही समझाया कि घूरे में दो साल बाद भी गोबर गर्म निकल रहा है और इस प्रकार का गोबर इतने दिनों बाद भी गोबर ही है न की खाद. ऐसा गोबर दीमक और चारे का बहुत ही बड़ा स्त्रोत है और चारे की वजह से खेत पर हानीकारक कीड़ों की संख्या में भी भारी वृद्धि हो जाती है जिसके फलस्वरूप दवाईयों के खर्च का अतिरिक्त बोझ किसानों के ऊपर आ पड़ता है और लाभांश में कमी आ जाती है.
अतः कम लागत के कच्चे भू-नाडेप, टटिया नाडेप अथवा पक्के नाडेप के ज़रीये ही गोबर की खाद बनायें और खेती की लगत में कमी लायें.
किसानों को समझाया गया की फिलहाल जो गोबर घूरों से खोदी जा रही है उसे खेत में डालने के पूर्व ज़मीन के ऊपर पाँच से दस दिन पानी डाल कर ठंडा कर लेने के बाद ही खेत में डालें और आगे से अनुशंसित तरीके से ही खाद बनायें.
प्रशिक्षण को सफल बनाने में ग्राम सचिव श्री जय सिंह जी और गाँव के ही प्रगतिशील कृषक श्री कुशवाहा जी तथा श्री रवि नन्दन सिंह चन्देल जी का सहयोग प्रशंसनीय रहा.   

महिलाओं की भागीदारी से बन सकता है लाभ का व्यवसाय कृषि


किसान यह नहीं जानते हैं कि वो जो बो रहे हैं वह बीज है अथवा दाना इसलिये उत्पादकता के प्रति अनिश्चितता बनी रहती है जिससे बचने के लिये वे आवश्यकता से अधिक बीज दर का उपयोग करते हैं और एक ओर लागत बढ़ाते हैं वहीं दूसरी ओर घनी बोनी करने के कारण प्राकृतिक संसाधन जैसे, धूप, हवा, जल, पोषक तत्व, फैलाव के लिये आवश्यक स्थान का उपयोग नहीं कर पाने के कारण उत्पादन में कमी आती है जिसके कारण आर्थिक नुकसान उठाते हैं.
जब तक बीज देहरी के अन्दर रहता है तब तक महिलायें ही इसका रख रखाव करती हैं. इसी बात को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा के वैज्ञानिक डॉ. चन्द्रजीत सिंह  ने सोयाबीन में बुवाई पूर्व बीज प्रबन्धन विषय पर ग्राम जोरी में 20 महिलाओं और 9 पुरुषों  को विधि प्रदर्शन करते हुए तीन साल कोष जमा कर एक बार नौ तपे के पूर्व गहरी जुताई, उपलब्ध बीज का अंकुरण परीक्षण, प्रति एकड़ बीज दर का निर्धारण, फफूंद्ननाशक तथा रायज़ोबीयम एवं पी.एस.बी कल्चर से बीजोपचार करना तथा 12-14 इंच कतार कतार से बोनी के लिये अपने परिवार के मुखिया को बोनी के लिये निर्णय लेने को ज़ोर दे कर सहायता करने की समझाईश दी.
कार्यक्रम के सफल आयोजन में केन्द्र के मृदा वैज्ञानिक डो बी.एस द्विवेदी की भूमिका महत्वपूर्ण रही.
श्रीमती. माया सिंह, श्रीमति सुधा मिश्रा, ग्राम सचिव श्री. जय सिंह, श्री भुवन सिंह, श्री राज भुवन सिंह की उपस्थिति एवं सहयोग उल्लेख्नीय रहा.       

उत्कृष्टता पुरस्कार से डॉ. अभय वानखेड़े सम्मानित

डॉ. अभय वानखेड़े, वैज्ञानिक, मुख्यमत्री से पुरुस्कार प्राप्त करते हुये 
       कृषि तकनीकी सूचना जानकारी के प्रभावी और त्वरित फैलाव के लिये सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग हेतु किसान मोबाइल संदेश कार्यक्रम के योजना निर्माण व क्रियान्वयन हेतु ज.ने. कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत कार्यरत कृषि विज्ञान केन्द्र सिवनी के प्रभारी कार्यक्रम समन्वयक डा. अभय वानखेड़े को म.प्र. शासन का प्रतिष्ठित र्इ-उत्कृष्टता पुरस्कार प्रदान किया गया। प्रदेश स्तर पर विभिन्न श्रेणियों में कुल 23 प्रतिभागियों का चयन उच्च स्तरीय चयन समिति द्वारा भोपाल में प्रस्तुतिकरण के आधार पर किया। कृषि मंत्री श्री गौरीशंकर बिसेन, सूचना प्रौधोगिकी मंत्री श्री भूपेन्द्र सिंह एवं प्रदेश के मुख्य सचिव श्री अंटोनी डिसाजी की गरिमामयी उपस्थिति में प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के कर कमलों द्वारा प्रदान किया गया। व्यकितगत श्रेणी में डा. अभय वानखेड़े के कार्य की सराहना करते हुये मुख्य सचिव महोदय ने इस कार्यक्रम के अधिकाधि उपयोग हेतु प्रेरित किया। जवाहरलाल नेहरू कृषि विद्यालय, जबलपुर (म.प्र.) के माननीय कुलपति प्रो. विजय सिंह तोमर के दिशा निर्देशन एवं संचालक विस्तार सेवायें डा. पी. के. मिश्रा के कुशल नेतृत्व में किये अनुकरणीय कार्य की प्रदेश के कृषि मंत्री श्री गौरीशंकरजी बिसेन द्धारा सराहा गया। 
ज्ञात हो कि डॉ. अभय वानखेड़े द्वारा वर्ष  2007 से किसानों को खेती की आवश्यक      जानकारी जैसे आदान उपलब्धता,  कृषकों के लिये  उपयोगी योजनायें एवं मौसम की सूचना को संदेश  के रूप में कृषकगण के मोबाईल फोन पर भेजने  का कार्य प्रारम्भ किया था जिस पर मंडी की  सूचना,  अनाज बेचने की जानकारी, बैंक में  जमा  एवं  निकासी की सूचना भी भेजी जा रही  है।
        उल्लेखनीय है कि कृषि विश्वविद्यालय के किसी  वैज्ञानिक को पहली बार यह सम्मान प्रदेश शासन द्वारा प्रदाय किया गया है। कृषि विज्ञान केन्द्र, सिवनी के समस्त वैज्ञानिकों एवं मित्रों इन्हें सम्मान प्राप्त करने हेतु बधार्इ दी है। 

खरीफ में खरपतवार, कीड़ों और दीमक से छुटकारा पाने हेतु अभी सक्रिय हों किसान


कृषि विज्ञान केन्द्र-रीवा के कार्यक्रम समन्वयक डॉ अजय कुमार पांडेय़ ने कृषक भाईयों और बहनों से आह्वान किया है कि खरीफ की तैयारी के पहले कृषि तकनीकी के योजना बनाने के लिये और नवीनतम जानकारी के लिये केन्द्र पर पधारें और वैज्ञानिक अनुशंषा मुफ्त पायें . आगे आपने कहा के बीज की जाँच करने के लिये गीले बोरे में सौ दाने बिछा कर दो दिन तक गीला रखें. यदि 75 दाने से अधिक दाने अंकुरित होते हैं तो बीज की अनुषंशित बीज दर का उपयोग करें.यदि बीज पुराना है तो कम दाने अंकुरित होंगे जिसे बदल कर नया बीज लेने में ही समझ्दारी है . वैसे भी प्रति तीन सालों  में बीज का ओज घट जाता है अतः उत्पादन मे कमी देखी जाती है.         
हिला कृषक तकनीक के वैज्ञानिक डॉ. चद्रजीत सिंह ने  जानकारी दी कि खरीफ के मौसम में सबसी बडी समस्या खरपतवार, दीमक और कीड़े की होती है और यदि  कृषक बहनें और किसान भाई इस समस्या से बचना चाहते हैं तो वर्षा ऋतु में घर के पीछे गढ्ढे (घूरे)  में पिछ्ले साल के एकत्रित से गर्म गोबर को निकाल कर खेत में न डालें बल्कि अभी तुरंत घूरे को खोद कर गोबर को ज़मीन के ऊपर इकट्ठा कर ढेर बनायें और पानी से तर कर दें. लगभग 15 दिन बाद फिर इस घूरे को फिर सींचें. एक महिने से डेढ़ महिने में यह गोबर ठंडा हो जायेगा और इसमें से भाप निकलना बन्द हो जायेगी. तब इसे खेत में डालें. जिससे खेत में रुपये में 60-70 पैसे तक खरपतवार दीमक और कीड़ों की संख्या में कमी आ जायेगी.
कृषि विस्तार वैज्ञानिक डॉ. किंजल्क सी. सिंह ने जानकारी दी कि तीन साल में नौतपे के पूर्व खेत की गहरी जुताई करवायें जिससे धूप की सीधी  किरणे मृदा पर पड़ने के कारण खरपतवार के बीज नष्ट हो जाते हैं और खरपतवार की संख्या में भारी कमी आ जायेगी. आपने आगे बताया कि रबी के मौसम में किस खेत में दल्हन फसल बोई गईं थीं कृषक भाई उन खेतों में धान्य फसलें बोयें और जहाँ धान्य फसलें बोई थीं उन खेतों में दलहनी फसलों की बोनी करें जिससे मृदा पोषण का लाभ फसलों को मिलेगा और पैदावार में वृद्धि होगी. खरीफ की बोनी फफून्दनाशक दवा और जैव ऊर्वरक से बीज के उपचार के बाद ही करें.  

रीवा ज़िले में सोयबीन की खेती के नये प्रयोग से अधिक लाभ


कृषि विज्ञान केन्द्र के कार्यक्रम सम्न्वयक डॉ. ए. के. पाँडेय ने बाताया कि केन्द्र द्वारा अंगीकृत किसानों के द्वारा सोयाबीन की खेती 140 किलो एस.एस.पी (राखड़), 18 किलो म्युरेट ऑफ पोटाश ( लाल खाद) और 13 किलो युरिया के सम्मिश्रण के उपयोग द्वारा किया जा रहा है. आपने आगे बताया कि तिलहन फसलों में तेल की मात्रा बढ़ाने हेतु राखड़ में उपलब्ध सल्फर नामक तत्व आवश्यक होता है जिससे सोयबीन के दाने बड़े तथा चमकदार बनते हैं और उपज का बाज़ार भाव बेहतर मिलता है.
कृषि में महिलाओं के योगदान विषय पर कार्य कर रहे वैज्ञानिक डॉ. चन्द्रजीत सिंह ने बाताया कि ग्राम लक्ष्मणपुर की महिला कृषक श्रीमति कलावती पटेल, पत्नी श्री रामसुमिरन पटेल ने नौतपे के पूर्व खेत की गहरी जुताई करवाई तथा बीज के अंकुरण की जाँच के उपरांत बीज का उपचार 150  ग्राम ट्राईकोडर्मा फफूँदनाशक तथा 250 ग्राम राईज़ोबियम और 600 ग्राम पी.एस.बी कल्चर प्रति एकड़ बीज से उपचारित करने के बाद 30किलो बीज प्रति एकड़ की बोनी कतार छोड़ पद्धति से की जिसमें कतार से कतार की दूरी 18 इंच है. इस दूरी के कारण सूर्य की किरणें  ज़मीन तक पहुँचती हैं और इस कारण कीटों का आक्रमण प्रभावशाली ढंग से कम होता है तथा पूरे पौधे पर सूर्य की रौशनी पड़ने के कारण समूचे पौधे में समान रूप से फलन होता है. कतार से कातार की बढ़ी हुई दूरी के कारण पौधे की शाखाओं में फैलाव भी अधिक होता है जिस कारण से फलन और अधिक होता है और उत्पादन में वृद्धि होती है.
केन्द्र के शस्य वैज्ञानिक डॉ. रघुराज किशोर तिवारी ने आगे बताया कि कुठुलिया में श्री प्रियेश कनौडिया ने भी इस प्रयोग को अपने खेत में दोहराया है साथ ही साथ आपने प्रत्येक दस कतार के उपरांत ढाई फुट का रास्ता कीट तथा खरपतवार के नियंत्रण हेतु दवाई छिड़कने के लिये छोड़ी है.
कृषि विस्तार की वैज्ञानिक डॉ, किंजल्क सी, सिंह ने बताया कि गुड़हर के कृषक श्री गोपेन्द्र त्रिपाठी जी ने सोयाबीन की अत्याधुनिक तकनीक अपनाते हुये मेड़- नाली विधि से सोयाबीन की बोनी की है. जिससे कतार से कतार की दूरी 12 इंच होती है और पौधे का फैलाव अच्छा होने के कारण फसलोत्पादन में वृद्धि होती है तथा सोयाबीन की बोनी, पानी से दूर मेड़ पर होती है, अधिक वर्षा होने कि स्थिति में नालियों से पानी खेत से बाहर हो जाता है और फसल को नुकसान नहीं होता है. चूँकि मेड़ भुरभुरी होती हैं इस कारण पौधे की जड़ का फैलाव अच्छा होता है और पौधे का विकास बेहतर होता है. जब पानी की कमी होती है तो यही नालियाँ सिंचाई के काम आती हैं. बाकी कृषि कार्यमाला कतार-छोड़ पद्धति की ही तरह ही अपनाई गई है.
कृषक भाई बहनों से केन्द्र ने अपील है कि वे इन खेतों का भ्रमण कर नई विधियों का अनुभव लें और अपने खेतों पर भी इन्हें अपना कर अधिकाधिक लाभ अर्जित करें. 

रीवा ज़िले में सोयबीन की खेती के नये प्रयोग


कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रमुख डॉ. ए. के. पाँडेय ने बाताया कि केन्द्र द्वारा अंगीकृत किसानों के द्वारा सोयाबीन की खेती 140 किलो एस.एस.पी (राखड़), 18 किलो म्युरेट ऑफ पोटाश ( लाल खाद) और 13 किलो युरिया के सम्मिश्रण के उपयोग द्वारा किया जा रहा है. आपने आगे बताया कि तिलहन फसलों में तेल की मात्रा बढ़ाने हेतु राखड़ में उपलब्ध सल्फर नामक तत्व आवश्यक होता है जिससे सोयबीन के 

दाने बड़े तथा चमकदार बनते हैं और उपज का बाज़ार भाव बेहतर मिलता है.


कृषि में महिलाओं के योगदान विषय पर कार्य कर रहे वैज्ञानिक डॉ. चन्द्रजीत सिंह ने बाताया कि ग्राम लक्ष्मणपुर की महिला कृषक श्रीमति कलावती पटेल, पत्नी श्री रामसुमिरन पटेल ने नौतपे के पूर्व खेत की गहरी जुताई करवाई तथा बीज के अंकुरण की जाँच के उपरांत बीज का उपचार 150  ग्राम ट्राईकोडर्मा फफूँदनाशक तथा 250 ग्राम राईज़ोबियम और 600 ग्राम पी.एस.बी कल्चर प्रति एकड़ बीज से उपचारित करने के बाद 30किलो बीज प्रति एकड़ की बोनी कतार छोड़ पद्धति से की जिसमें कतार से कतार की दूरी 18 इंच है. इस दूरी के कारण सूर्य की किरणें  ज़मीन तक पहुँचती हैं और इस कारण कीटों का आक्रमण प्रभावशाली ढंग से कम होता है तथा पूरे पौधे पर सूर्य की रौशनी पड़ने के कारण समूचे पौधे में समान रूप से फलन होता है. कतार से कातार की बढ़ी हुई दूरी के कारण पौधे की शाखाओं में फैलाव भी अधिक होता है जिस कारण से फलन और अधिक होता है और उत्पादन में वृद्धि होती है. केन्द्र के शस्य वैज्ञानिक डॉ. रघुराज किशोर तिवारी ने आगे बताया कि कुठुलिया में श्री प्रियेश कनौडिया ने भी इस प्रयोग को अपने खेत में दोहराया है साथ ही साथ आपने प्रत्येक दस कतार के उपरांत ढाई फुट का रास्ता कीट तथा खरपतवार के नियंत्रण हेतु दवाई छिड़कने के लिये छोड़ी है.

कृषि विस्तार की वैज्ञानिक डॉ, किंजल्क सी, सिंह ने बताया कि गुड़हर के कृषक श्री गोपेन्द्र त्रिपाठी जी ने सोयाबीन की अत्याधुनिक तकनीक अपनाते हुये मेड़- नाली विधि से सोयाबीन की बोनी की है. जिससे कतार से कतार की दूरी 12 इंच होती है और पौधे का फैलाव अच्छा होने के कारण फसलोत्पादन में वृद्धि होती है तथा सोयाबीन की बोनी पानी से दूर मेड़ पर होती है, अधिक वर्षा होने कि स्थिति में नालियों से पानी खेत से बाहर हो जाता है और फसल को नुकसान नहीं होता है. चूँकि मेड़ भुरभुरी होती हैं इस कारण पौधे की जड़ का फैलाव अच्छा होता है और पौधे का विकास बेहतर होता है. जब पानी की कमी होती है तो यही नालियाँ सिंचाई के काम आती हैं. बाकी कृषि कार्यमाला कतार-छोड़ पद्धति की ही तरह ही अपनाई गई है.

कृषक भाई बहनों से अपील है कि वे इन खेतों का भ्रमण कर नई विधियों का अनुभव लें और अपने खेतों पर भी इन्हें अपना कर अधिकाधिक लाभ अर्जित करें.   

चने में समन्वित कीट नियंत्रण विषय पर प्रशिक्षण


ग्राम कोठी में आयोजित प्रशिक्षण 
कृषि महाविद्यालय रीवा (म.प्र.) के माननीय अधिष्ठाता डॉ. एस. के. राव के मार्गदर्शन  एवं कृषि विज्ञान केन्द्र के कार्यक्रम समन्वयक डॉ. ए.के. पाँडेय के निर्देशन में ग्राम कोठी में रबी दलहन में एकीकृत कीट नियंत्रण के उपाय विषय पर 42 ग्रामीण महिलाओं एवं कृषक भाईयों को प्रशिक्षण दिया गया ।
        कृषक गण के खेतों के अवलोकन कर वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि दलहन फसल विशेषकर चने की फसल पर इल्लीयों का आक्रमण प्रारम्भ हो चुका है जिसकी रोकथाम तुरंत करना आवश्यक है. इसी बात की जानकारी कृषकों को  प्रशिक्षण के माध्यम से दी गयी.
डॉ. किंजल्क सी सिंह ने बाताया कि चने की कतार के बीच गमछा बिछा कर चने के पौधे को हिलायें यदि गमछे पर 4-5 इल्लीयाँ गिरें तो समझें कि इल्ली का प्रकोप को रोकना आवशयक हो गया है. चने के खेत में पक्षीयों का आना भी इल्ली के प्रकोप की ओर इंगित करता है.
ऐसी परिस्थिति में अथवा फूल अवस्था आने पर खेत में अंग्रेज़ी के T’  (टी अक्षर) अथवा Y’ (वाय अक्षर) के आकार की  चने की फसल से ऊँची 20 खूँटीयाँ प्रति एकड़ लगायें जिसपर पक्षी आ कर बैठें और इल्लीयों को चुनकर हानिकारक स्तर के नीचे ला दें.  किंतु फल आने पर इन खूँटीयों को निकाल दें जिससे पक्षी फलों को नुकसान नहीं पहुँचायें. इसके अतिरिक्त मेड़ और खेत से चौड़ी पत्तीयों की खरपतवार विषेशकर खेत से लमेरा राई के पौधे निकाल कर नष्ट करें. चौड़ी पत्तीयों पर इल्लीयाँ अंडें देती हैं जिससे इल्लीयों का संक्रमण कई  गुना बढ़ जाता है.
डॉ. चन्द्रजीत सिहं ने बताया कि नीम की पत्तीयों को उबाल कर और निचोड़कर काढ़ा बनाकर तथा प्रति टंकी दो चम्मच कपड़े अथवा बर्तन धोने का पाऊडर मिला कर  हर पाँच दिन में फसल पर छिड़काव करें जिससे इल्लीयों के आक्रमण  कमी आयेगी. रसायनिक उपायों पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत में तो कमी आयेगी ही साथ ही साथ फसल तथा मृदा के स्वास्थ पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ेगा. फेरोमॉन फन्दा और प्रकाश प्रपंच लगाने से भी खेत में आने वाले कीटों की जानकारी मिलेगी और मित्र कीट रासायनों के प्रकोप से बचेंगे .
इन सभी उपायों के बावजूद भी यदि कीट नष्ट नहीं  होते तो 35 मिली ट्रायज़ोफॉस प्रति टंकी मिलाकर डालें . प्रति एकड़ 18-20 टंकी दवाई का छिड़काव करें. 
        प्रशिक्षणार्थियों की ओर से श्रीमति साधना मालवीय ने प्रशिक्षण को समयानुकूल तथा कृषकों के लिये सार्थक एवं उपयोगी बताया एवं कृषि विज्ञान केन्द्र को तक्नीकी जानकारी प्रदान करने के लिये धन्यवाद दिया। प्रशिक्षण में औषधीय वैज्ञानिक डॉ. निर्मला सिंह तथा वैज्ञानिक पौध प्रजनन डॉ. आर.पी जोशी  सहयोग प्रशंसनीय रहा । 

महिलाओं की भागीदारी से बन सकता है लाभ का व्यवसाय कृषि

किसान यह नहीं जानते हैं कि वो जो बो रहे हैं वह बीज है अथवा दाना इसलिये उत्पादकता के प्रति अनिश्चितता बनी रहती है जिससे बचने के लिये वे आवश्यकता से अधिक बीज दर का उपयोग करते हैं और एक ओर लागत बढ़ाते हैं वहीं दूसरी ओर घनी बोनी करने के कारण प्राकृतिक संसाधन जैसे, धूप, हवा, जल, पोषक तत्व, फैलाव के लिये आवश्यक स्थान का उपयोग नहीं कर पाने के कारण उत्पादन में कमी आती है जिसके कारण आर्थिक नुकसान उठाते हैं.
 जब तक बीज देहरी के अन्दर रहता है तब तक महिलायें ही इसका रख रखाव करती हैं. इसी बात को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा के वैज्ञानिक डॉ. चन्द्रजीत सिंह  ने सोयाबीन में बुवाई पूर्व बीज प्रबन्धन विषय पर ग्राम जोरी में 20 महिलाओं और 9 पुरुषों  को विधि प्रदर्शन करते हुए तीन साल कोष जमा कर एक बार नौ तपे के पूर्व गहरी जुताई, उपलब्ध बीज का अंकुरण परीक्षण, प्रति एकड़ बीज दर का निर्धारण, फफूंद्ननाशक तथा रायज़ोबीयम एवं पी.एस.बी कल्चर से बीजोपचार करना तथा 12-14 इंच कतार कतार से बोनी के लिये अपने परिवार के मुखिया को बोनी के लिये निर्णय लेने को ज़ोर दे कर सहायता करने की समझाईश दी.
कार्यक्रम के सफल आयोजन में केन्द्र के मृदा वैज्ञानिक डो बी.एस द्विवेदी की भूमिका महत्वपूर्ण रही.
श्रीमती. माया सिंह, श्रीमति सुधा मिश्रा, ग्राम सचिव श्री. जय सिंह, श्री भुवन सिंह, श्री राज भुवन सिंह की उपस्थिति एवं सहयोग उल्लेख्नीय रहा.    google.co.in

आधुनिक कृषि तकनीक अपनायें और खेती की लागत में कमी लायें


क़ृषि आदान का क्रय करने के पूर्व कृषक भाईयों को सजग रहना बहुत आवश्यक है. आदान क्रय करने के पूर्व नवीनतनम तकनीकी जानकारी के लिये कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा पधार कर सम्बन्धित वैज्ञानिक से निःशुल्क सलाह लें तत्पश्चात कृषि आदान के विक्रय की दुकान जा कर वैज्ञानिकों कि अनुशंसा के अनुसार ही कृषि अदान क्रय करें, अदान हमेशा नगद में क्रय करें, आदान क्रय करते समय एक्स्पायरी तिथि की जाँच अवश्य करें एवं खरीदे गये आदान का कैश मैमो अवश्य लें. उपरोक्त जानकारी अपने उद्बोधन में, विषय विषेशज्ञ डॉ. किंजल्क सी. सिंह ने ग्राम जोरी में, कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा की कार्यक्रम समन्वयक, डॉ. निर्मला सिंह के दिशा निर्देशन में, ‘कृषि आदान क्रय में सावधानिय़ाँ’ विषय पर दिये जा रहे प्रशिक्षण में दी. आपने आगे बताया के आदान का क्रय समय से पूर्व करें ताकि आदान की उप्लब्धता सुनिश्चित हो सके.

केन्द्र के ही वैज्ञानिक, डॉ. चन्द्रजीत सिंह ने कहा की किसान भाई किसान क्रेडिट कार्ड स्कीम का लाभ लें और समय पर बैंक का पैसा लौटायें और डिफॉल्टर बनने से बचें ताकि आने वाले वर्षों में भी इस स्कीम का लाभ आप लेते रहें और समय से पूर्व कृषि आदान क्रय कर सकें.

केन्द्र के मृदा वैज्ञानिक डॉ. बी. एस. द्विवेदी ने जहाँ एक ओर ग्राम के कृषकों के खेत से मृदा का जाँच हेतु मृदा के नमूने एकत्रित किये वहीं जवाहर कल्चर का खरीफ फसलों में उपयोग की समझाईश दी. आपने ज़ोर देते हुये कहा कि जवाहर कल्चर का क्रय किसान भाई, कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा अथवा मृदा विभाग, कृषि महाविद्यालय, रीवा से ही करें.

केन्द्र के द्वारा एंट्री पोईंट एक्टिविटी हेतु, ग्राम भ्रमण के दौरान वैज्ञानिकों ने गोबर और कचरे से भरे, दो साल पुराने गड्ढे को खोदते हुये किसान को मौके पर ही समझाया कि घूरे में दो साल बाद भी गोबर गर्म निकल रहा है और इस प्रकार का गोबर इतने दिनों बाद भी गोबर ही है न की खाद. ऐसा गोबर दीमक और चारे का बहुत ही बड़ा स्त्रोत है और चारे की वजह से खेत पर हानीकारक कीड़ों की संख्या में भी भारी वृद्धि हो जाती है जिसके फलस्वरूप दवाईयों के खर्च का अतिरिक्त बोझ किसानों के ऊपर आ पड़ता है और लाभांश में कमी आ जाती है.

अतः कम लागत के कच्चे भू-नाडेप, टटिया नाडेप अथवा पक्के नाडेप के ज़रीये ही गोबर की खाद बनायें और खेती की लगत में कमी लायें.

किसानों को समझाया गया की फिलहाल जो गोबर घूरों से खोदी जा रही है उसे खेत में डालने के पूर्व ज़मीन के ऊपर पाँच से दस दिन पानी डाल कर ठंडा कर लेने के बाद ही खेत में डालें और आगे से अनुशंसित तरीके से ही खाद बनायें.


प्रशिक्षण को सफल बनाने में ग्राम सचिव श्री जय सिंह जी और गाँव के ही प्रगतिशील कृषक श्री कुशवाहा जी तथा श्री रवि नन्दन सिंह चन्देल जी का सहयोग प्रशंसनीय रहा.   

कृषि महाविद्यालय रीवा में राज्यस्तरीय कार्यशाला संपन्न

माननीय संचालक विस्तार सेवायें कार्यशाला के अवसर
    जवाहरलाल नेहरू  कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के माननीय कुलपति प्रो. गौतम कल्लू के दिशा निर्देशन में कृषि विज्ञान केन्द्र, कृषि महाविद्यालय, रीवा के किसानों के विकास के लिए निरंतर प्रयासरत है । कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा प्रत्येक दो वर्ष में जिले के दो अंगीकृत ग्रामों को आदर्श ग्राम की तरह विकसित करता है इन अंगीकृत ग्रामों में कृषक प्रक्षेत्र परीक्षण तथा अग्रिम पंक्ति प्रदर्शनों द्वारा तकनीकी का स्थानांतरण किया जाता है । इसी तारतम्य में आई.सी.ए.आर. जोन-7 के जोनल प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ.यू.एस.गौतम की अध्यक्षता में कृषि महाविद्यालय रीवा में दिनांक 20-22 अप्रैल, 2010 को तीन दिवसीय राज्यस्तरीय वर्कशाप दलहनी एवं तिलहनी फसलों के अग्रिम पंक्ति प्रदर्षन विषय पर संपन्न हुआ जिसमें म.प्र. के 47 कृषि विज्ञान केन्द्रों के कार्यक्रम समन्वयक एवं विषय वस्तु विशेषज्ञों ने कृषकों के खेतों पर डाले गये प्रयोगों के परिणामों को प्रस्तुत किया । कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की प्रतिमा पर दीपप्रज्वलन से शुरु हुआ, सर्वप्रथम ज.ने.कृषि विश्वविद्यालय के संचालक विस्तार सेवायें, डॉ. के.के. सक्सेना तथा राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ग्वालियर के संचालक विस्तार सेवायें, डॉ. एस.एस. तोमर द्वारा अपने अपने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया । कृषि महाविद्यालय रीवा के अधिष्ठाता डॉ. एस.के.राव ने बताया कि जिले में उपलब्ध संसाधनों एवं कृषकों की आवश्कताओं के अनुसार तकनीकी गावों में पहुँचाई जानी चाहिए । जोनल प्रोजेक्ट डायरेक्टर, आई.सी.ए.आर. के बरिष्ट वैज्ञानिक, डॉ.एस.आर.के.सिंह द्वारा आवंटित बजट का मदवार उपयोग करने का सुझाव दिया गया ।
            कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा की कार्यक्रम समन्वयक डॉ. श्रीमती निर्मला सिंह ने अंगीकृत ग्रामों में डाले गये दलहनी एवं तिलहनी फसलों के परिणामों को सदन के समक्ष प्रस्तुत किया ।
            डॉ.टी.आर.शर्मा तकनीकी अधिकारी संचालक विस्तार सेवायें ज.ने.कृ.वि.वि., जबलपुर द्वारा सुझाया गया कि विश्वविद्यालय द्वारा कार्ययोजना निश्चित हो जाने के बाद कोई परिवर्तन करने के लिए संचालक विस्तार सेवायें से अनुमति लेना आवश्यक है ।
            डॉ. वाय.एम.कूल, संचालक विस्तार सेवायें, राजमाता सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर ने बताया कि जल संरक्षण के लिए पौधरोपण सबसे उपयुक्त संसाधन है । कार्यक्रम के समापन अवसर पर ज.ने.कृ.वि.वि. जबलपुर के सेवा निवृत्त संचालक विस्तार सेवायें डॉ. आर. ए. खान ने ग्रामीण महिलाओं एवं नवयुवकों के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा आयोजित प्रशिक्षणों को उपयोगी बताया । इस अवसर पर शक्तिमान रोटावेटर्स के श्री आशीष पटेल तथा ईफको के जिला प्रबंधक श्री भूपेष राठौर का योगदान सराहनीय रहा ।
            कृषि महाविद्यालय रीवा के प्रो. डॉ.एस.एन.श्रीवास्तव, डॉ.आर.ए.साठवाने, डॉ.यू.एस.बोस, तथा डॉ.एस.के.त्रिपाठी ने कालेज की सुविधाओं को उपलब्ध कराने का हर संभव प्रयास किया । इस अवसर पर कृषि महाविद्यालय रीवा के पूर्व अधिष्ठाता, डॉ. आर.पी.सिंह उपस्थित रहें । उक्त अवसर पर कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा के सभी वैज्ञानिकों डॉ.आर.पी.जोशी डॉ. आर.के.तिवारी, डॉ.सी.जे. सिंह, डॉ.श्रीमती किंजल्क सिंह, डॉ.रूपेश् जैन, डॉ. राजेश सिंह, डॉ.बी.एस.द्विवेदी, श्री एम.के.मिश्रा तथा अन्य स्टाफ श्री आर.एस.पटेल, उमेश वर्मा एवं ब्रिजेश सेन का कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा ।
कार्यशाला में अनुशंषा की गयी कि स्थानीय मौसम एवं जलवायु की अनुकूलताओं के अनुसार ही किस्मों का चयन अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन हेतु किया जाना चाहिए । प्रदेश के समस्त कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा लिए गये दलहन एवं तिलहन अग्रिम पंक्ति प्रदर्श्नों के परिणाम प्रस्तुत करने के साथ साथ अग्रिम कार्ययोजना पर बिंदुवार विचार विमर्श् किया गया । कार्यशाला के तीसरे दिन समीक्षा बैठक की गई ।
कार्यक्रम के अंत में कृषि विज्ञान केन्द्र, रीवा द्वारा संगठित, प्रशिक्षित, प्रेरित समूह- साथ रुचि समूह पड़रा के द्वारा तैयार आँवले से तैयार मुरब्बा, सुपारी, कैंडी, कैंडी बॉल इत्यादी का सेवन कर लुत्फ उठाया वहीं जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वफविद्यालय के संचालक विस्तार सेवायें, डॉ. के.के. सक्सेना तथा संचालक विस्तार सेवायें, राजमाता विजय राजे सिन्धिया कृषि विश्वविद्यालय,  डॉ. वाय.एम कूल ने समूह से आँवले का मुरब्बा क्रय कर समूह को प्रोत्साहन प्रदान किया.   
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